औरों को हँसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ ! - कामायनी

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Wednesday, 9 August 2017

इसलिए व्यंग्य…


इस विषय को कई तरह से देखा जा सकता है. क्या हमसे यह कैफियत मांगी जा रही है कि व्यंग्य किसलिए? वैसे इन दिनों बहुत सारा व्यंग्य ऐसा लिखा भी जा रहा है कि पूछने की तमन्ना तो हमारी भी होती है कि ऐसा व्यंग्य किसलिए? पर मैं उम्मीद करता हूं कि सम्पादक इतना कड़वा सवाल करने से कतराएगा. सहृदय सम्पादक का काम ऐसे प्रश्नों से आखें मींचे रहना है जिनसे सामना करने से स्वयं व्यंग्यकार छुपते फिर रहे हैं.

तो क्या सम्पादक आश्चर्य कर रहा है कि यह आजकल क्या चल रहा है कि व्यंग्य इतना लिखा जा रहा है यह विधा साहित्य के केंद्र में न भी आ गयी हो पर यह सेंटरस्टेजके आसपास तो मंडराने ही लगी है. वह दौर कब का जा चुका है जब इस बात का स्यापा पीटा जाता था कि हाय, व्यंग्य स्पिरिट मात्र है और लोग इसे फालतू ही विधा मनवाने पर आमादा हैं. व्यंग्य को तो परसाई जैसे लोग ही विधा का दर्जा दिलाकर चले गये जो कदाचित, संकोच में ही इसे मात्र स्पिरिट कहते रहे. कभी इस बात पर गहन विचार होना ही चाहिए कि हिंदी साहित्य की राजनीति की वे क्या परिस्थितियां रही होंगी जिन्होंने परसाई से यह कहलवाया? क्या यह परसाई द्वारा उसी राजनीति की एक राजनीतिक बयानद्वारा तात्कालिक काट मात्र थी जिसे हिंदी साहित्य आज तक व्यंग्य के विरुद्घ इस्तेमाल किया करता है? पता नहीं. परंतु यह तय है कि तब परसाईजी के साथ कुछ तो रहा होगा वर्ना, ‘यूं ही कोई बेवफा नहीं होता!बहरहाल.

व्यंग्य इसीलिए, का क्या जवाब बनता है?

कोई आपसे यह प्रश्न पूछ रहा है कि यार, तू यहां किसलिए? यह जो कविता, कहानी, आलोचना के बामनों की पंगत चल रही थी, और बढ़िया ही चल रही थी सो तू, इस पगंत में यहां कैसे? आभिजात्य के ठसकों से भरे विद्वतजनों की इस महफिल में, जहां जीवन के गूढ़ रहस्यों पर गहन वायवीय विचार-विमर्श चल रहे थे वहां तू समकालीन समाज की विसंगतियों के कीचड़ में लिथड़े पांव लेकर कहां घुस आया? तू जो अप्रिय प्रश्नों को सीधे पूछने की हिमाकत करता है और जीवन के गूढ़ार्थों में भी सीधे ही घुसता है- तू है कौन? तू जो कला के प्रचलित मुहावरों तथा विषयों के तिलिस्म को तोड़ने का दुस्साहस करता हुआ इस लोहगढ़ी में इतने अंदर तक घुसा चला आ रहा है, तू है कौन? और किसलिए? व्यंग्य आखिर किसलिए? बता न? क्या व्यंग्य मात्र एक किस्म के एक्टिविज्म से प्रेरित विधा है. क्या यह कुछ स्वयंसेवी किस्म ऐक्टिविस्ट लेखकों का हिंदी साहित्य की बस्ती में पाप्यूलिस्ट किस्म का जुलूस मात्र है जिसे इतने लोग देख रहे हैं कि बस्ती सतर्क हो गयी है कि यार, यह हो क्या रहा है? जब बात को, बड़े कलापूर्ण तरीके से, ढांक-ढूंक के कविता में यूं कहा जा सकता था कि सांप भी मर जाता और लाठी भी सलामत रहती, तब यह कौन है जो कड़वे सत्य की लाठी को कलापूर्वक तथा बड़े कौशल से भांजता हुआ सांप के पीछे यूं आया है कि सीधे ही मुठभेड़ पर आमादा प्रतीत होता है? फिर यह भी तय करना है कि व्यंग्य मात्र विसंगतियों से मुठभेड़ का एक और तरीका है जैसा कि बहुत सारे व्यंग्यकार स्वयं कहते फिरते हैं या कि बात और कहीं गहरी है? विसंगतियों पर चोट मात्र की बात ही होती तो फिर दिल में वह दर्द कहां से आता जो अच्छे व्यंग्य की पहली और आखिरी शर्त है? करुणा के बिना व्यंग्य कैसा?

फिर विसंगति अन्याय आदि का खेल क्या केवल राजनीति, प्रशासन तथा समाज व्यवस्था में ही है या बात इससे भी कहीं गहरी है? विसंगतियों को पकड़ने की नज़र तब मिलती है जब आप जीवन को पकड़ने वाली नज़र रखते हों? क्या आप में जीवन में गहरे उतरने की कला है? कहीं, गहरे उतरने पर आपकी श्वास तो नहीं उखड़ने लगती? तभी, श्वास बचाते हुए, आप कहीं किनारे, किनारे- जीवन के उथले जल में बगुले की भांति विसंगतियों का शिकार करते हुए तुकबंदी वाली कविता, सपाटबयानी वाले व्यंग्य और शब्दों के खेल में उलझी कहानियां तो नहीं रचते रहते? जीवन से आपका प्रेम कितना गहन है? क्या आप गरीब की आह के उस ताप को महसूस कर पाते हो जिसमें लोहा भी भस्म हो जाता है? क्या व्यंग्य गुदगुदाने का एक तरीका है, मीठी चोट है, विसंगतियों पर प्रहार मात्र है या फिर यह जीवन से पाठक की नये सिरे से नयी तरह की पहचान कराने वाला अनोखा लेखन है? व्यंग्य में कविता भी होती है पर यह कविता मात्र नहीं. व्यंग्य में कथा भी हो सकती है पर कहानी से अलग ही सत्ता है इसकी. व्यंग्य में निबंध भी हो सकता है पर वह व्यंग्य में आकर निबंध भर नहीं रह जाता. व्यंग्य में नाटक भी खूब होता है पर वह आम लिखे गये नाटकों से एकदम अलग चीज़ होती है. तो व्यंग्य में हर विधा उपस्थित है. और अनुपस्थित भी, तभी तो व्यंग्य को विधा मानने को वे लोग राजी ही नहीं जिन्होंने विधा की अपनी शात्रीय परिभाषा बना रखी है. यह शात्र सम्मत परिभाषा में फिट ही नहीं होता. पर इसमें व्यंग्य बेचारा क्या करे? व्यंग्य तो सीमाओं के अतिक्रमण में विश्वास रखता है. इसे आप अराजक कहते हैं तो यह आपकी मूढ़ता और आपकी जड़ता है. व्यंग्य की व्याप्ति असीमित है. तभी तो आप एक ही व्यंग रचना में निबंध से शुरू होकर नाटक, कविता तथा कथा के तत्व भी उसी रचना में पा सकते हैं और तब भी व्यंग्य में इस हरकत को व्याकरण सम्मत मान लिया जाता है! 

जीवन बेहद सुंदर है. यह इतना सुंदर है कि संवेदनशील रचनाकार इसे तनिक भी असुंदर होते नहीं देख सकता. वे सारी शक्तियां, वे सारे अन्याय, वे सारे मनुष्य-विरोधी काज जो जीवन को कुरूप बनाने का षड्यंत्र करते हैंउसकी संवेदना को झिंझोड़कर रख देते हैं. इन राक्षसी शक्तियों की पहचान मनुष्य जाति से कराने का काम रचनाकार इसीलिए करता है ताकि जीवन की सुंदरता कायम रहे. व्यंग्य लिखकर वह अपने ही संवेदनशील मन की रक्षा करता है. वास्तव में व्यंग्य उस खलबली का दस्तावेजीकरण है जो समाज से निकलकर रचनाकार के संवेदनशील मन में उतर आती है. व्यंग्य निश्चित ही छपास की भूख बुझाने का साधन नहीं है जो बहुत से तथाकथित व्यंग्यकारों ने बना रखा है. व्यंग्य कोई कैरियर भी नहीं है. व्यंग्य लिखना येन -केन-प्रकारेण स्वयं को लेखक सिद्घ करवाने का जुगाड़ मात्र भी नहीं हो सकता है. व्यंग्य चुटकुलेबाजी का मौका भी नहीं है. व्यंग्य एक सपाट बयानबाजी भी नहीं है. व्यंग्य तो अपने समकालीन समय के साथ एक सार्थक, अनिवार्य और बेहद जटिल संवाद है जो साहित्य को साहित्य की अन्य विधाओं की सीमाओं से और आगे ले जाता है. यह नितांत समकालीन होते हुए भी सार्वभौमिक सरोकारों को व्यक्त करने की कठिन कला है. व्यंग्य लिखना कोई आसान काम नहीं है. यह खाला का घर नहीं कि यूं ही, बिना तैयारी के, कोई भी इसमें घुसा चला आये. व्यंग्य-लेखन गहन समाजशात्रीय अध्ययन और समझ तो मांगता ही है, यह व्यंग्यकार में एक गहरी राजनीतिक समझ की मांग भी करता है जो सत्ता के बारीक, पेंचदार खेल को समझ सके. व्यंग्यकार किसी भी सहृदय कवि से गज्यादा भावुक होता है. वह दिल टूटने और विरह की शायरी न भी लिखता हो पर उसके हृदय में वैसी ही खलबली मची रहती है.

परदुखकातर इस हद तक होता है कि उससे दूसरों का दुख बर्दाश्त ही नहीं होता. वह इस कदर करुणाविगलित होता है कि उस करुणा का थोड़ा सा हिस्सा भी रचना में आ जाये तो पाठक भीग जाता है. व्यंग्यकार होने के लिए एक भता ही मारी का बना शख्त चाहिए. हर शख्स व्यंगकार नहीं हो सकता. कई बड़े कवियों ने, कथाकारों ने कोशिशें की हैं पर कांख- कांख कर भी वे एक ढंग का व्यंग्य नहीं लिख सके. व्यंग्य के लिए एक अलग ही जीवन दृष्टि चाहिए. एक अलग ही किस्म की कलाकारी चाहिए. व्यंग्य का विचार पक्ष, भाव पक्ष और कला पक्ष स्वयं में इन सबकी एक नैसर्गिक समझ भी मांगते हैं और इन सबमें दीक्षित होने के लिए वृहद अध्ययन भी. व्यंग्य केवल व्यंग्य साहित्य का अध्येता होकर ही नहीं लिखा या समझा जा सकता. इसके लिए आपको कवि से ज्यादा कविताई, कहानीकार से ज्यादा किस्सेगोई और पत्रकार से ज्यादा समकालीन घटनाओं का अध्ययन चाहिए.

यह सब एक जगह इकट्ठा हो जाये तभी व्यंग्य तथा व्यंग्यकार का जन्म होता है. इसीलिए व्यंग्य लिखा जाता है. इसीलिए व्यंग्य लिखना इतना कठिन है. इसीलिए व्यंग्य एक बड़ा साहित्य अनुज्ञन है. इसीलिए व्यंग्य लिखना बेहद ज़िम्मेदारी का काम है जिसे हमारे अनेकानेक व्यंग्यकार आज तक नहीं समझ सके हैं.

व्यंग्य इसीलिए लिखा जायेगा क्योंकि यदि साहित्य समाज का दर्पण है तो व्यंग्य एक साथ ही दर्पण, खुर्दबीन, दूरबीन और केतिगोस्कोप भी है ऐसा शीसाविज्ञान नहीं बना पाया है पर साहित्य बना लिया है। व्यंग्य इसलिए है और बेहद जरूरी है।

-ज्ञान चतुर्वेदी  

(नवनीत के मार्च 2014 अंक से साभार)

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