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Thursday, 24 August 2017

संवाद / अँधेरे के खिलाफ उजाले की जिद

                                                 


अँधेरे के खिलाफ उजाले की जिद : एक समीक्षात्मक टिप्पणी
              
    यह समीक्षा-लेख वाणी प्रकाशन से सुधीश पचौरी के संपादकत्व में प्रकाशित पत्रिका वाक्के मार्च 16, अंक 22 में छपा है. इस समीक्षा के  लेखक हैं एक शोध-छात्र जगन्नाथ दूबे. दूबे ने इस लेख में राजेश जोशी के काव्य-संकलन जिदकी समीक्षा की है. लेकिन इसमें जोशी की काव्य-प्रकृति खुल नहीं पाई है. समीक्षक एक शोध-छात्र हैं पर वह इसमें अपनी शोध-दृष्टि का उपयोग करते नहीं दिखाई देते.
    समीक्षक इस समीक्षा में अनुभव करते हैं कि हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जो मानवीयता के लिए भयानक संकट का समय है. वह यह भी अनुभव करते हैं कि यह संकट....कवि या कविता की तरफ से पैदा किया गया संकट नहीं है. यह संकट सत्ता की ओर से....पैदा किया जा रहा संकट है. लेकिन उनका ध्यान इस ओर नहीं गया कि भारत के एक वाद-बद्ध साहित्यकार-समूह, जो ऐसी ही बातें करता है, को प्रभावित करने वाले सार्त्र कहते हैं- Hell is the other people. माओ का सिद्धांत है  First we should choose who is Our friend and who is our enemy (माओ का यह वक्तव्य तब का है जब वह चीनी-सत्ता को च्युत करने की तैयारी कर रहे थे). समीक्षक ने सत्ता का जो सरलीकरण किया है उसमें ये भी आते हैं. ये अपने आप में एक सत्ता की हैसियत रखते थे. ये कितने खतरनाक वक्तव्य हैं, समीक्षक स्वयं समझ सकते हैं.
    कविता हमें मुक्त-हृदय करती है. मुक्त-हृदय? क्या हृदय से मुक्त जैसे मुक्त-काम- कामना से मुक्त? तब तो मनुष्य जी ही नहीं पाएगा. शायद समीक्षक का आशय हो हृदय पर पड़े भारों से मुक्त. जोशी के जिदसंकलन की कविताओं ने समीक्षक को कितना मुक्त-हृदय किया, यह तो वही जानें पर स्वतंत्रता आंदोलन के समय मैथिली शरण गुप्त की भारत भारतीने इस देश के जन को खूब मुक्त-मन किया. मन्मथ नाथ गुप्त ने इसी के गीतों को गा-गा कर स्वाधीनता नामक मूल्यवान त्तत्व से यहाँ के जन को जोड़ा. मुक्तिबोध की अंधेरे मेंकविता के मूल आशय को पाने के लिए प्रखर बुद्धवादी लोग आज भी सिर खपा रहे हैं. इस जनपक्षधर कवि का जनकौन है मैं आज भी ढूँढ़ रहा हूँ. क्यों कि खेत खलिहान में रहने वाला या मजदूर वर्ग तो इसे समझने से रहा, भवानी प्रसाद मिश्र जैसे कवि ने भी इसे एक बार पढ़ कर अलग रख दिया, दुबारा पढ़ने के लिए नहीं उठाया.                                                                                
अँधेरे की बात-
    अब ध्यान फिराते हैं इस लेख के शीर्षक पर. इस शीर्षक में एक तरह से जिदसंकलन का मूल कथ्य समेटा गया लगता है. समीक्षक अनुभव करता है कि राजेश जोशी अँधेरे समय में उजाला दिखाने वाले कवि तो हैं ही, अँधेरे का पर्दाफाश भी करने वाले कवि हैं. उजाला फैलाने और अँधेरे का पर्दाफाश करने के लिए वह जिदठाने हुए हैं. वह अपनी बात अंधेरा और उजाला का मानवीकरण कर रखते हैं.
    समीक्षक ने इस समीक्षा-लेख का नाम रखा हैअँधेरे के खिलाफ उजाले की जिद. तो समीक्षक को अपने लेख में इन दो बिंदुओं पर मुख्य रूप से फोकस रखना चाहिए था, यह अँधेरा क्या है और उजाला क्या है, जो नहीं रखा है.
    समीक्षक गोलमटोल शब्दों में कवि के अँधेरे की प्रतीति को सामाजिक अँधेरा कहते हैं. और इस सामाजिक अँधेरे को सत्ता द्वारा पैदा
किया मान लिए हैं. शायद अँधेरे के पर्दाफाश से उन्हें यह तथ्य मिला है.  
तो समाज में केवल सत्ता द्वारा पैदा किया ही अँधेरा है? और किस प्रकार के संकट और किस प्रकार के अनुभव उन्हें मिले, समीक्षक नहीं बताते.
    समीक्षक यह भी नहीं बताते कि यह सामाजिक अँधेरा है क्या. आज समाज भी अनेक है- दलित समाज, समाजवादी समाज, मार्क्सवादी समाज वगैरह. सबके अपने अँधेरे और सबके अपने उजाले हैं. इसे वह पाठक की समझ पर छोड़ देते हैं. (ऐसा कर समीक्षक का अपने दायित्व से बच लिकलना आसान है, आज के समीक्षकों में यह आम प्रवृत्ति दिखाई देती है.)
    कवि के अँधेरे को जानने के लिए मैंने इस संकलन की कविता अंधेरे
के बारे में कुछ वाक्य पर ध्यान जमाया. इसमें मुझे ये पंक्तियाँ मिलीं
अँधेरे में सबसे बड़ी दिक़्क़त यह थी कि वह क़िताब पढऩा
नामुमकिन बना देता था।
    वैसे अँधेरे का काम ही क्या है. यह तो स्वाभाविक है.
    अँधेरा का यहाँ मानवीकरण किया गया है. अँधेरे ने जो भूतकाल में किया उसीका इसमें जिक्र किया गया है. वह किताब पढ़ना नामुमकीन कर देता थामतलब अब नहीं करता. समीक्षक यह नहीं बताता कि थाके प्रयोग से कवि का क्या प्रयोजन है. क्या हैके प्रयोग से वह प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता था. समीक्षक की पूरी समीक्षा हैमें ही है,
    एक बात मेरी. मेरे जाने उजाले का न होना ही अँधेरा का होना है. किताबों पर पड़ती रौशनी जब हटती जाती है तब अँधेरा पसरता जाता है. यह तो कवि भी अनुभव करता है. यह एक सामान्य प्रक्रिया है इसमें अस्तित्वहीन अँधेरे का क्या दोष. उसने क्या बुरा किया?
    इस किताब को बुद्धि के उजाले का प्रतीक कैसे माना जाए. किताब
तो खुद अन्य उजाले से प्रकाशित होने पर ही दिखती है.
    कवि का अगला कथन है-
पता नहीं शरारतन ऐसा करता था या क़िताब (उजाला) से डरता था
    जिसका अस्तित्व ही उजाले के न होने से है वह शरारत क्या करेगा.
    इस कविता के पढ़ने पर अँधेरे का कोई स्पष्ट रूप नहीं उभरता. कवि इस अँधेरे के कई चेहरे का जिक्र करता है - 
लेकिन अँधेरे के अनेक चेहरे थे
         पॉवर-हाउस की किसी ग्रिड के अचानक बिगड़ जाने पर
         कई दिनों तक अन्धकार में डूबा रहा
         देश का एक बड़ा हिस्सा ।
    यह सामाजिक अंधकार तो नही है, तकनीक के फेल्योर से पैदा अंधकार है. ये पंक्तियाँ काव्यात्मक भी नहीं हैं. अँधेरे का मानवीकरण कर देने से ये काव्य-पंक्तियाँ नहीं बन जातीं. इससे क्या प्रतीकार्थ या लक्ष्यार्थ निकाला जाए. इस अँधेरे को दूर करने के लिए पावर हाउस के ग्रिड को ठीक करना ही काफी है जो एक इलेक्ट्रीशियन कर सकता है. वहाँ राजेश जोशी का उजाला या उसकी जिद क्या करेगी.
अँधेरे का एक चेहरा यह-
       लेकिन इससे भी बड़ा अँधेरा था
       जो सत्ता की राजनीतिक ज़िद से पैदा होता था
       या किसी विश्वशक्ति के आगे घुटने टेक देने वाले
       ग़ुलाम दिमाग़ों से !
    लगता है यहाँ समीक्षक की शोध-दृष्टि नहीं पड़ी है. कवि इस कविता में अँधेरे को पैदा करने वाली सत्ता की राजनीतिक जिद की बात करता है, अँधेरे के खिलाप उजाले की जिद की नहीं. इस कविता में अँधेरे को तोड़ने के लिए उजाले को जिद करते नहीं दिखाया गया है. मेरे देखे राजनीतिक सताएँ अँधेरा नहीं फैलातीं वरन् उजाले के केन्द्रों को ध्वस्त करती हैं और अँधेरा पाँव पसार देता है. गुलाम हों या आजाद उनमें अँधेरा नहीं फैलाया जाता, उनके पास उजाला पाने की जो युक्ति है उसे छीन लिया जाता है. क्योंकि वस्तुतः उजाले का ही अस्तित्व है अँधेरे का नहीं.
    राजनीति ने आज के समाज में बहुत अँधेरा पैदा किया है. इसमें कोई दो राय नहीं. यह उसने मनुष्य की स्वतंत्रता (उजाला) छीन कर किया है. दो उदाहरण सामने ही है, रूस के नोवेल पुरस्कार निजेता साल्झेनित्सिन और चीन के विचारक ल्यु श्याबाओ का. इन दोनों को सत्ता के सामाजिक विचार से भिन्न मत रखने के कारण जेल के भीतर डाल कर लेखन जगत और विचार जगत में अँधेरा पैदा किया गया. समीक्षक सत्ता द्वारा अँधेरा पैदा करने का उदाहरण कबीर और मुक्तिबोध के साथ किए गए सत्ता के व्यवहार को बताते है. वह भूल गए हैं कि सिकंदर लोदी धर्मांध था. उसने हाथी के पैर तले कबीर को कुचलवा कर अपने धर्म को ऊपर करना चाहा था. इससे कोई अँधेरा पैदा होता तो वह धार्मिक अँधेरा होता सामाजिक नहीं. किंतु वह यह अँधेरा पैदा कर नहीं सका. और मुक्तिबोध कोई इतिहासविद नहीं थे. कुछ इतिहासकारों के आधार पर उन्होंने विद्यार्थियों के लिए आर्य संस्कृति का जो चित्र खींचा था वह सर्वस्वीकार्य नहीं था. इसपर प्रतिबंध से कौन सा अँधेरा फैला? प्रतिबंध तो प्रेमचंद के सोजे वतन पर भी लगा था. अब रोमिला थापर आर्यों का इतिहास इक्ष्वाकु से मानती हैं, इसे कौन मानेगा.
    कवि के अनुसार इस राजनीतिक जिद से एक बौद्धिक अँधेरा भी पैदा होता था -  
एक बौद्धिक अन्धकार मौक़ा लगते ही सारे देश को
हिंसक उन्माद में झोंक देता था ।
सहृदय जन को यहाँ कुछ सोचने का अवसर मिलता है. यह बौद्धिक
अँधेरा है क्या, समीक्षक तो इसे स्पष्ट नहीं करते. मेरी समझ से सोच विवेक को अपहृत कर लेना ही बौद्धिक अँधेरा है. तो इसके उलट सोच विचार को पैदा करना ही उजाला प्रदान करना होगा. यह तो कृत्रिम ढंग से किया जा सकता है, शैक्षणिक जैसी विधियों से. कवि इस कविता में यह उजाला परदा को हटा कर या बंद कर करता है (आगे वे पंक्तियाँ उद्धृत की गई हैं). यह उजाला पहले से ही स्वतंत्र उपस्थित है.
    किंतु सत्ता हमेशा बौद्धिक अँधेरा ही पैदा करती हो ऐसा नहीं है. सत्ता ने कला, विचार-विवेक के क्षेत्र में भी योगदान दिया (उजाला पैदा किया) है, कलाकारों को सहयोग देकर. मनुष्य के सर्वांग को प्रकाशित करने वाले गौतम बुद्धों के उजाले पर तत्कालीन सम्राटों ने प्रतिबंध लगा कर अँधेरा पैदा करने की कोशिश नहीं की. वे उस उजाले को उनसे छीन भी कैसे सकते थे. मिनांडर ने तो नागार्जुन से बाकायदा शास्त्रार्थ किया था. राजपूत कला, मुगल कला जैसी कलाएँ भी सत्ता द्वारा विकसित हुईं हैं.
    कृत्रिम उजाला अँधेरे को दूर नहीं कर सकता. क्यों कि उसका होना न होना अधूरे व्यक्तियों के हाथ में होता है. जैसे कलबुर्गी मूर्तिपूजा को अंधविशास मान कर उसे जन से दूर करना चाह रहे थे. जबकि उन्हें जानना चाहिए था कि मीरा ने परमात्म तत्व के अनुभव के लिए मूर्ति को ही माध्यम बनाया था. और इस अंधविश्वास को मिटाने के लिए वह मूर्तियों की उपेक्षा करने की सीख देते थे. कहते थे कि मूर्तियों पर तो मूता जा सकता है. (यह समाचार उस समय के हिंदू दैनिक में छपा था.) मजा यह कि वह सामाजिक उजाले के पैरोकार थे.
अब उजाले की बात.
    समीक्षक के अनुसार कवि उजाला दिखाने वाला और अँधेरे का पर्दाफाश करने वाला कवि है. .
कविता अंधेरे के संबंध में कुछ वाक्य में राजेश जोशी ने रौशनी का भी जिक्र किया है-
रोशनी के पास कई विकल्प थे
      ज़रूरत पडऩे पर जिनका कोई भी इस्तेमाल कर सकता था
      ज़रूरत के हिसाब से कभी भी उसको
      कम या ज़्यादा किया जा सकता था
      ज़रूरत के मुताबिक परदों को खीच कर
      या एक छोटा सा बटन दबा कर
      उसे अन्धेरे में भी बदला जा सकता था
    कवि की रौशनी (उजाला) विकल्पों वाली है. इसका इस्तेमाल (शब्द पर ध्यान दें) किया जा सकता है, वह भी जरूरत के मुताबिक. यह रौशनी हमारे हृद-मन को प्रकाशित करने वाली नहीं, टार्च की रौशनी-सी है. क्या यही रौशनी अँधेरे (कवि ने इसे किसी गढ़ अर्थ में लिया है) को हटाने की जिद किए हुए है?
    मैं सोच में पड़ गया हूँ कि कविता में रौशनी (उजाले) के उजाले ने जिद कर रखी है तो उस जिद का जिक्र कहाँ है. यहाँ तो अवरोध हटाओ, अँधेरा गायब. अवरोध खड़ा कर दो अँधेरा हाजिर. यह अवरोध खड़ा करने वाला कौन है. केवल सत्ता? कबीर के उजाले को कोई सत्ता नहीं रोक सकी थी. आज के दिन सत्ता की एक बड़ी ताकत अमरीका (निक्सन का) ने ओशो को जहर दिया, उन निहत्थे को बाईस देशों तक खदेड़ा, वहाँ ठहरने के लिए उतरने नहीं दिया, उन्हें उनके अपने देश में रहने के लिए उसने तब अनुमति दी जब राजीव सरकार ने यह स्वीकार कर लिया कि किसी से उन्हें मिलने नहीं दिया जाए. प्रकांतर से समाज से काट दिया जाए. क्या ओशो के प्रकाश को रोका जा सका? उनके प्रकाश ने तो कोई जिद भी नहीं की. निक्शन की ज्यादती इसलिए नहीं थी कि दुनिया में अँधेरा पैदा करना है. वह इसलिए थी कि कहीं उनकी सिखावन ईसाइयत के ऊपर न हो जाए. वह स्वयं एक क्रूसेड (धर्मयुद्ध) की अगुआई करना चाह रहे थे. दुनिया में हैरी पॉटर के बाद सबसे अधिक बिकने वाली उन्हीं की प्रकाशप्रकीर्णक पुस्तकें है. उनकी पुस्तकों को छापने के लिए आज वह बाजार लालायित है, जिस बाजार को अन्यों के साथ समीक्षक भी कोसता है. बाजार अपने हानि-लाभ को जरूर देखता है. किंतु पुस्तक में कुछ जीवनदाई है तो उसे भी अंगीकार करता है. फणीशवर नाथ रेणु के मैला आँचल को प्रकाशक ओमप्रकाश ने खोज कर छापा था.
    राजेश जोशी की रौशनी का एक और विकल्प है
    एक रोशनी कभी कभी बहुत दूर से चली आती थी हमारे पास
    एक रोशनी कहीं भीतर सेकहीं बहुत भीतर से
    आती थी और दिमाग को एकाएक रोशन कर जाती थी ।
    कवि यहाँ कुछ दार्शनिक-सा हो गया लगता है. समीक्षक ने इन, कहीं दूर से और कहीं भीतर से आती रौशनियों पर विचार ही नहीं किया है. ये कैसी रौशनियाँ (उजाले) हैं. सत्ता द्वारा पैदा किए गए अँधेरे का फाश करने, उसे दूर करने के लिए, उससे उलझने के लिए कवि के हाथ में जो उजाला है वह कैसा है, पर्दा हटाने से आने वाला या बटन दबाकर पैदा किया उजाला या इन दूर से और भीतर से आती रौशनियों का उजाला. इन अंतिम ऱौशनियों के उजाले का प्रभाव ऐसा है कि यह कवि के दिमाग को एकाएक रौशन कर देती थी (अब शायद नहीं करती). दिमाग तो किसी व्यक्ति का ही रौशन हो सकता है समाज का नहीं. तो फिर इससे सामाजिक अँधेरा केसे दूर हो सकेगा. समाज तो अनेक लोगों से बनता है. समाज के हर व्यक्ति पास ये ऱौशनियाँ आएँ तो ही तभी समाज रौशन हो सकता है, इस रौशनी को आने देने में या उसे आने से रोकने में सत्ता क्या कर सकती है. मुहम्मद साहब को ये रौशनियाँ उतरी थीं उनके विरोधी इसे रोक नहीं सके थे. इस उजाले को कवि फैलाता तो अँधेर को हटाने की ओर उसका एक कदम हो सकता था. किंतु कवि को केवल इन रौशनियों का अहसास भर है. केवल अहसास वाली रौशनी से न तो कोई विरोध सफल हो सकता है न कोई आंदोलन. वह भी कवि का एक शायर दोस्त उसके मन में एक शंका डाल देता है-
एक शायर दोस्त रोशनी पर भी शक करता था
    वह शक ही नहीं करता था. वह-
           कहता थाउसे रेशा-रेशा उधेड़ कर देखो
           रोशनी किस जगह से काली है
रौशनी देने वाले स्रोत के जिस हिस्से से रौशनी नहीं आ रही हो वह हिस्सा काला दिख सकता है पर रौशनी किस जगह से काली है यह देखने की बात समझ के बाहर है. कवि के दोस्त कुछ अनूठी दृष्टि वाले है.  
    तो यह है कवि राजेश जोशी का उजाला जिसकी प्रकृति ही अस्थाई है. जो खुद ही एक बटन के सहारे अंधेरे में बदला जा सकता है वह किस दम के साथ अंधेरे के खिलाफ कोई जिद ठान सकता है.
    कहा जा सकता है कि उक्त कविता में अंधेरे और उजाले के बिंब खड़े किए गए हैं. तो मैं इतना ही कहूँगा कि कबीर के पास भी एक उजाला था, स्थिर प्रकृति का. उस उजाले को जन तक पहुँचाने के लिए उन्होंने एक काव्य-बिंब खड़ा किया, लुकाठी और घर का. यह लुकाठी उजाले का पुंज प्रज्ज्वलित करती हुई लकड़ियों की ढेरी में से निकाल ली गई एक जलती हुई लकड़ी है, जो किसी घर (अंधेरा) को जला कर उजाला पैदा कर सकती है. (उजाला आता है तो अँधेरा स्वतः हटता जाता है, इसे अँधेरे का जलना कहा जा सकता है). उजाले और अंधेरे के ये कबीर के बिंब बहुत स्वाभाविक हैं. हमारे बोध में सहज रूप से उतर जाते हैं.
अब उजाले की जिद की बातः
    समीक्षक ने अपनी समीक्षा में यह साफ नहीं किया है कि कवि के पास उजाला कौन सा है और उजाले की जिद की बात करने लगता है.  कवि की जिदशीर्षक से लिखी दो कविताओं में ऐसा कुछ भी नहीं दिखता. द्वीतीय जिदकविता में निराशा कवि के पीछे पड़ी हुई है. कवि मीटिंग का बहाना बनाकर उससे पीछा छुड़ाना चाहता है. यह कह कर कि तुम वही बातें कहोगी जो अन्य कहते हैं. वे (अँधेरे के) विरुद्ध एजेंडा बनाते हैं, किसी उद्यान में मीटिंग करते हैं, समाचार बनाकर छपवा देते हैं. लेकिन उनपर भी कभी कभार उदासी छा जाती है. प्रथम जिदकविता से पता चलता है कि वे विरोध के लिए अपनी जेबें निचोड़ते हैं, पोस्टर बनाते हैं, प्रदर्शन करते हैं. पर यह सब तो शासन से कुछ माँगने के लिए किया जाता है. ऐसे विरोध को समीक्षक कवि के उजाले की जिद मान लेता है. हालाँकि कवि ने कविता में इस विरोध को अन्यों द्वारा किया जाता बताया है. यह जिद कवि की है, कैसे कहा जा सकता है. क्या यह जिद है भी?
    समीक्षक कवि को बेचैनी से भरा एक संबेदनशील कवि कहते हैं. गजब की बेचैनी और संवेदनशीलता है इन कवि में. वह इतना बेचैन हैं कि अपनी गुरुत्वाकर्षणकविता में न्यूटन से गुरुत्वाकर्षण के अपने नियम को वापस ले लेने का उनसे गुहार करते हैं. क्योंकि पृथ्वी फिसल रही है (अगर यह अनुभूति है तो कवि अनोखी अनुभूति वाले कवि हैं). क्या नियम वापस ले लेने से पृथ्वी का फिसलना बंद हो जाएगा? न्यूटन एक वैज्ञानिक थे. वैज्ञानिकों के आविष्कार को मनुष्य जाति का आविष्कार माना जाता है. पर यह कवि सीधे उससे अपना पिंड छुड़ा लेते हैं- न्यूटन तुम अपना..नियम वापस ले लो...राषट्राधयक्षों की जबान कब फिसल जाए कोई नहीं कह सकता. जहाँ तक संवेदनशीलता का प्रश्न है, इन पंक्तियों से कौन सी संवेदनशीलता संप्रेषित होती है. मेरे जाने कविता में संवेदनशीलता पिरोना होता है.
    समीक्षक बहुपठित लगते हैं, शोध-छात्र हैं. कवि की बेचैनी और संवेदनशीलता के संभवतः उदाहरणस्वरूप ही ये पेक्तियाँ उद्धृत की हैं.
      अँधेरे से जब बहुत सारे लोग डर जाते थे
      और उसे अपनी नियति मान लेते थे
      कुछ ज़िद्दी लोग हमेशा बच रहते थे समाज में
      जो कहते थे कि अँधेरे समय में अँधेरे के बारे में गाना ही
      रोशनी के बारे में गाना है ।
वो अँधेरे के समय में अँधेरे के गीत गाते थे
अपनी वेचैनी में कवि पीछे मुड़ कर (थेकी अभिव्यंजना) देखता है. वहाँ उसे बहुत से लोग डरे हुए दिखते हैं जो अँधेरे को अपनी नियति मान लिए हैं. कुछ जिद्दी लोग भी दिखे जो जिंदगी को हार बैठे थे और अँधेरे का गीत गाने में ही अपनी सुरक्षा समझते थे, अँधेरे के बारे में गाना ही वे रौशनी के बारे में गाना मानते थै. यह किन लोगों की तरफ ईशारा है, भारतीय लोगों की या पश्चिमी लोगों की तरफ? मैथिली शरण गुप्त ने तो अतीत के अँधेरे में हुए उजाले की और उसे प्रयोग करने वालों के गीत अपने समय के अँधेरे में गाए थे, और निराला ने भी. इन लोगों ने अँधेरे के बारे में गीत गाकर उजाले का गीत समझने को नहीं कहा था.
    अँधेरे के बारे में गाना रौशनी के बारे में गाना कैसे है, समीक्षक ने इसको स्पष्ट करने में रुचि नहीं ली है. अँधेरे के बारें गाना, मेरी समझ से अँधेरे की सत्ता को मानकर उसकी जुगाली करना ही है. यह भारतीय मनीषा की जातीय प्रकृति नहीं है. फिर राजेश जोशी को इसका इलहाम कहाँ से हुआ. जरा इन पंक्तियों पर गौर करें-
क्या अँधेरे वक्त में भी गीत गाए जाएँगे
       हाँ, गाए जाएँगे
       अँधेरे वक्त में भी अँधेरे के गीत गाए जाएँगे। ---  बर्तोल्त ब्रेखत       
(वसुधा, मार्च-17)
    बर्तोल्त ब्रेख्त जर्मनी के कवि और नाटककार थे. बीसवीं सदी के जर्मनी के संदर्भ में उन्होंने यह कविता लिखी थी. आश्वित्ज कैंप के उत्पीड़न से वहाँ का एक चिंतक इतना निराश हो गया था कि उसने कविता लिखने की ही मनाही कर दी थी जबकि हिरोशिमा-नागासाकी की तबाही से जापान ने हिम्मत नहीं हारी. संभव है ब्रेख्त ने सोचा हो अँधेरे के गीत में अँधेरे को दिखाते हुए उसमें चतुराई से जागरण की ध्वनि लपेट कर गाया जाए. हो सकता है उन्हें अपने जर्मनी देश के लिए ऐसा करना ही उपयुक्त लगा हो. जर्मनी के अवाम की नब्ज उनमें धड़कती थी. लेकिन इस अँधेरे के गीत को उजाले का गीत तो नहीं कहा जा सकता. कवि के लिए भारतीय संदर्भ में भारतीय अवाम की नब्ज को अपने हृदय में धड़कने देना चाहिए. अब इक्कसवीं सदी के भारत के संदर्भ में उक्त पंक्तियों का अनुभव कितना उपयुक्त बैठता है. देखने की बात है. जापानियों के उत्साहावेग को हम क्यों नहीं कोट करते?
    समीक्षक यह नहीं समझा पाए हैं कि उजाला और उजाले की जिद से इन पंकतियों का क्या ताल मेल है.
पुनश्चः
    यह शोध करने योग्य है कि राजेश जोशी का अँधेरे और उजाले का चिंतन उनके अपने चिंतन की उपज हैं या ब्रेख्त से लिया गया है.
मेरा ध्येय राजेश जोशी के जिदकोव्य-संकलन की समीक्षा करना नहीं, जगन्नाथ दूवे की समीक्षा पर एक समीक्षात्मक टिप्पणी लिखनी थी. आज की आलोचना में आलोच्य की विवेचना की क्या पद्धति है यही जानने की मेरी अभिप्सा थी. क्योंकि अक्सर पढ़ने को मिलता है कि आज की आलोचना अपने पूर्व स्तर से च्युत हो गई है. मैंने इस समीक्षा में अनुभव किया कि संकलन में जो कहा गया है उसपर ध्यान न टिकाकर उसके माध्यम से समीक्षक अपनी बातें कहने में अधिक रुचि रखते है.
आलोचना ऐसी होनी चाहिए जिससे उस पुस्तक को पढ़ने में पाठक की रुचि जगे.

-शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव
गोरखपुर

Saturday, 19 August 2017

समकालीन कवि और कविता / अनिल पाण्डेय



समकालीन कवि और कविता
अनिल कुमार पाण्डेय

       कविता का लिखना, दिखाई दे रही घटनाओं का, प्रतीत हो रही बातों का, ठीक-ठीक उसी रूप में रख देना भर नहीं है | ऐसा करने से कविता के समाप्त होने का जितना खतरा होता है उससे कहीं अधिक कवि की कविताई संशय के घेरे में आ जाती है | जब तक पढ़ी जा रही कविता के माध्यम से पाठक कुछ सोचने और अधिक से अधिक कल्पना करने के लिए बाध्य न हो तब तक किसी भी लेखनी को कविता मानने से इनकार किया जा सकता है | एक कविता पाठक को कई अर्थ देती है | कभी मुक्तिबोध ने कहा था “मुझे कदम कदम पर चौराहे मिलते हैं” इस चौराहे को समझने और उस पर खड़े होने के आनंद को कोई भी सहृदय पाठक बड़ी गहराई से महसूस करता है | इस समय उसके हृदय में बहुत कुछ उठता-मचलता है | बहुत कुछ उठने-मचलने की प्रक्रिया जहाँ से शुरू होने लगे समझ लो कविता आपके अन्दर समाहित हो रही और आप कविता के अन्दर |
       आज समकालीन हिंदी कविता जगत में दो तरह के कवि वर्तमान हैं| एक वे, जो सीधे घटनाओं को देखकर कविता की रचना कर रहे हैं और दूसरे वे जो घटनाओं को स्वयं घटित होता महसूस कर कविता की रचना कर रहे हैं | पहले प्रकार के कवियों में सपाटबयानी का खतरा बढ़ जाता है | यहाँ कविता का कहन महत्त्वपूर्ण न होकर घटनाओं को प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करना अधिक जरूरी माना जाता है | यह भी कि जहाँ वैचारिकता हावी होगी वहां कला जरूर मौन दिखाई देगी | ऐसे कवियों के लिए शब्दों से सीधा टकराव अपेक्षित है, ‘प्रतीक और बिम्ब’ सरीखे शब्द बेईमानी हैं| जबकि दूसरे प्रकार के कवि घटनाओं के संसर्ग से उपजे समस्याओं को ठीक उसी रूप में नहीं रख देते जैसा कि उनके सामने घटित हुआ है| वे पहले तो स्वयं घटना बन कर जीते हैं| उसके प्रभाव को अपने अन्दर महसूसते हैं| फिर उस घटना के प्रतीकात्मक अर्थ-सृष्टि के नियामक-तत्त्वों का चयन करते हैं| ऐसे कवियों का दृष्टिकोण विकसित होता जाता है और मात्र सामाजिक संबंधों में घटित होने वाली घटनाएँ प्रभावी न होकर सम्पूर्ण सांस्कृतिक परिवेश इनकी चिंतन के केन्द्र में दिखाई देता है|
         कविता की सपाटबयानी में वैचारिकता को ढोने की मजबूरी अधिक होती है| अब यह मजबूरी अपने खेमे के लोगों की वाहवाही प्राप्त करने की भी हो सकती है और त्वरित प्रतिष्ठित होकर छा जाने की भी| यहाँ एक गजब का भीड़तन्त्र काम करता है| अगुवाई करने वाला झंडा उठाने के लिए तत्पर हो उठता है और शेष उसके सुर में सुर मिलाने के लिए उत्प्लावित दिखाई देते हैं| यहाँ कवि का काम कविता का सृजन करना नहीं वैचारिकता से मेल खाते श्लोगन (नारे) को तैयार करना होता है| उस श्लोगन की सार्थकता इसी में है कि उसका पाठ करने वाला जोर-जोर से चिल्लाकर उसकी सार्थकता को स्पष्ट करे| संभव है इसके लिए किसी पुराने प्रतिष्ठित कवि के प्रति उन्हें गालियाँ भी निकालनी पड़े, भीड़ निकालती भी है| कवि और मंत्रमुग्ध होकर और सुन्दर नारे की सर्जना में स्वयं को व्यस्त कर लेता है| समकालीन हिंदी कविता जगत को अब तक कुल चार कविता-संग्रह दे चुकी सरला माहेश्वरी की इस कविता की कुछ पंक्तियों को देखिये, जहाँ नारेवादी वैचारिक विरोध के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं मिलने वाला है-
आवश्यक सूचना !
अब पूरा देश राजभक्त होगा !
राजभक्त विमान के सभी यात्रियों के लिए
आवश्यक सूचना !
दिल्ली से नागपुर जाने वाले सभी यात्रीगण !
कृपया ध्यान से सुनें !
विमान के लिए सुरक्षा जांच हो चुकी है
सभी यात्रियों से निवेदन है कि/
विमान में केवल हमारे द्वारा निर्देशित
खाद्य सामग्री
पाठ्य सामग्री
ध्यान सामग्री
ही/ ले जाने की अनुमति है !
यात्रियों को उनकी सुविधा के लिए हम फिर से याद दिलाना चाहते हैं/ कि/
विमान में सिर्फ निर्धारित राज-पोशाक में ही
यात्रा की अनुमति है |”[1]
         सवाल ये है कि आखिर ऐसी सूचनाओं को कविता का शक्ल देकर हम पाठकों के अन्दर कौन-सा काव्य संस्कार पैदा करना चाहते हैं? उनकी संवेदनाओं को किस प्रकार की रचनात्मकता का बोध कराना चाहते हैं? यह समझने का भी प्रयत्न किया जाना चाहिए कि नारे वही लगा सकता है जो भीड़ का हिस्सा हो| एक कमाल की स्थिति यहाँ और देखी जाती है, वह ये कि कवि अब तक सृजन-कार्य को छोड़कर भीड़-तन्त्र के संगठन में निमग्न हो उठता है| सरला माहेश्वरी की कविताओं में इस स्थिति की वर्तमानता को बखूबी देखा जा सकता है जब वे भीड़ तंत्र को इकठ्ठा करने के लिए ‘रोहित वेमुला’ ‘कन्हैया कुमार’, ‘कलबुर्गी’ आदि की राजनीतिक आवाज को कविता का शक्ल दे रही होती हैं| यहाँ पाठक हैरान हो जाता है और कविता की खोज में आया हुआ स्वयं उनके साथ नारे लगाने के लिए अभिशप्त हो उठता है, पक्ष या विपक्ष में| कई जगह तो ऐसा दिखाई देता है जैसे सरला स्वयं नारा लगाने लगती हैं और वह मानती भी हैं “इच्छा होती है/ जोर-जोर से चीखें.../ मुर्दाबाद ! मुर्दाबाद|”[2] अब कवयित्री का मुर्दाबाद का नारा लगाने के लिए जी करना कहीं न कहीं कविता के पक्ष में तो नहीं है? इसका निर्णय आज का गंभीर और सजग पाठक भी नहीं कर पा रहा है| इनके पक्ष में आलोचक सुनील कुमार का यह वक्तव्य हतप्रभ करता है “जिन पाठकों ने इनकी कविताओं को ठीक से पढ़ा है, उनको मालूम होगा कि सरला की कविताएँ पाठकों से सीधे संवाद करती हैं, कला की सीमाओं के पार भी जाकर संवाद करती हैं और मन के अन्दर एक उत्प्रेरणा को जन्म देती हैं|”[3] अब यह किस प्रकार की उत्प्रेरण होती है इनके पाठक अच्छी तरह से जानते हैं|
         युवा कवि अरविन्द भारती का एक संग्रह बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित होकर आया है| नारेबाजी और वैचारिक दृष्टि से उनकी कविताओं को भी यहाँ पर परखा और देखा जा सकता है| कहीं गहरे में उन्हें यह आभास है कि यदि वे अपने कवि-स्वभाव में नारेबाजी नहीं करेंगे, उन्हें आने वाले दिनों में दलित कवि का खिताब नहीं मिल सकेगा| अम्बेडकरवादी उन्हें जीने नहीं देंगे और इस तरह वे अपनी बस्ती में ही “परदेशी” होकर गुमनाम हो जायेंगे| हालांकि ऐसा करना भी गलत नहीं था लेकिन इस स्थिति में ये सपाटबयानी के जो शिकार होते हैं और अंततः कविता-प्रेमी को जो देने में सफल हो पाते हैं, यहाँ देखा जा सकता है-“हमारी जाति के/ लोगों से/ करते हो/ घृणा/ कहते हो/ उन्हें/ नीच/ अछूत/ गंदी नाली का/ कीड़ा/ जिनके/ छूने मात्र से/ हो जाते हो/ तुम अपवित्र/ छिड़कने लगते हो/ गौमूत्र/ और/ मेरे जिस्म को/ छूकर/ जो हवा/ तुम्हारे नथुनों से/ टकराती है/ तुम्हें/ मदहोश करती है|/ हाड़ मांश से बना/ जिस्म/ ताजमहल सा प्रतीत होता है/ मेरे यौवन/ स्वर्ग सुंदरी/ मेनका सामान/ इंद्र बन/ चाहते हो जिसे भोगना/ चल हट/ कुकुर कहीं के/ धूर्तता की सारी हदें/ पार कर दी है/ तू ने/ भागता है/ या दूं/ लात खींच के|”[4] पहली बात तो इस कविता की सारी लकीरों को हटाकर देखा जाए तो कवित्व जैसा कुछ भी कहीं भी नहीं दिखाई देता| दूसरे, इनकी अन्य कविताओं को भी पढ़ते हुए ऐसा आभास होता है कि कवि ‘‘लात खींच के’’ किसी कुकर्मी को देने के बजाय अपने पाठकों को ही दे रहा है| यह स्थिति अन्यानेक कवियों के यहाँ देखी जा सकती है| धर्म और महापुरुषों की मान्यताओं का प्रचार करना अलग बात है लेकिन कविता की शक्ल में इन्हें प्रचार का माध्यम बनाना स्वयं के व्यक्तित्व का तर्पण तो है ही कविता की भी असमय हत्या है|
          यदि यह कहा जाए कि समकालीन हिंदी कविता में आज बहुत से कवि भीड़ को जुटाने में व्यस्त हैं तो अत्युक्ति न होगी| नवांकुर कवि तो हैं ही चोटी के कवियों को भी इस तंत्र में बूड़ते-उतराते देखा जा सकता है| इस दृष्टि से उदय प्रकाश की रचनाओं पर दृष्टि देना आवश्यक हो जाता है| समकालीन हिंदी कविता में खूब पढ़े और सराहे गये इस कवि की अधिकांश कविताएँ महज एक नारा सी प्रतीत होती हैं| वैचारिकता के केंद्र में बहुत कुछ समेटने के मोह में कविता न रहकर गद्य की परिधि में सिमटती हुई दिखाई देती हैं| उदय प्रकाश को कविता से अधिक चिंता अपनी वैचारिकता की है, जो इस कविता में देखी जा सकती है और इसी बहाने उसके प्राप्य पर विचार किया जा सकता है-

उस दिन पांडेजी/ बुलबुल हो गये थे |
कलफ़ लगाकर कुर्ता टांगा
कोसे का असली, शुद्ध कीड़ोंवाला चांपे का,
धोती नयी सफ़ेद, झक बगुला जैसी |

और ठुनकती चल पड़ी/ छोटी सी काया उनकी |

छोटी-सी काया पांडेजी की
छोटी-छोटी इच्छाएँ
छोटे-छोटे क्रोध
और छोटा-सा दिमाग |

गोष्ठी में दिया भाषण, कहा-
‘नागार्जुन हिंदी का जनकवि है’
फिर हँसे कि ‘मैंने देखो
कितनी गोपनीय 
चीज को खोल दिया यों |
यह तीखी मेधा और
वैज्ञानिक आलोचना का कमाल है |’
एक स-गोत्र शिष्य ने कहा-
‘भाषण लाजवाब था, अत्यंत धीर-गम्भीर
तथ्यपरक और विश्लेष्णात्मक

हिंदी आलोचना के खच्चर
अस्तबल में
आप ही हैं एक मात्र
काबुली बछेड़े |’

तो गोल हुए पांडेजी/ मंदिर के ढोल जैसे |

ठुनुक-ठुनुक हँसे
फिर बुलबुल हो गये
फूलकर मगन !”[5]
          इस कविता को पढने के बाद यह समझना शेष रह जाता है कि आम पाठक को पांडेजी के भाषण और आलोचना की गति-दुरगति से क्या लेना देना है? यह काम तो उदय प्रकाश अपनी एक पुस्तक “ईश्वर की आँख” में पहले ही कर चुके थे| प्रश्न यह भी है कि यदि वे ऐसा न करते तो फिर उन्हें यह बड़प्पन कहाँ से हाशिल होता कि हिंदी जगत के कटु सत्य को बेनकाब किया है? इन कवियों की कविताओं को देखने और पढ़ने के बाद यह तो सुनिश्चित हो ही जाता है कि भीड़ के केंद्र में कला की कम शोर की गुन्जाईस अधिक होती है| शोर के लिए फेसबुक जैसे माध्यम की अनिवार्यता को खारिज नहीं किया जा सकता| इसलिए भी क्योंकि यहाँ पर समर्थन हर हाल में करना ही है| विरोध और संवाद के लिए कहीं कोई स्थान नहीं है| शोशल साइटों के बादशाह बन चुके बहुत से कवियों को आत्मप्रसंशा की बीमारी लग चुकी है| ये एक दिन में एक साथ कई-कई कविताएँ रचते दिखाई दे जाते हैं| इनके रचनात्मक धरातल की पड़ताल करने पर ऐसा कुछ भी नहीं प्राप्त होता जिसे देर-समय तक कविता की शक्ल में याद किया जाता रहे| नारे और वैचारिकता के समर्थक कवियों द्वारा काव्य में अनुभव और अनुभूति की संकल्पना को भी ख़ारिज करने का षड्यंत्र आज है, स्वीकारना तो पड़ेगा ही|
        वैचारिकता के खूँटे में बंधकर कविता का सृजन करना बचीखुची मानवीय संभावनाओं को तिलांजलि देना है| ऐसी रचनाओं में ‘लोक’ कहीं गहरे में प्रभावित होता है| ऐसा इसलिए है क्योंकि विचार मानव मस्तिष्क की उपज हैं| हित-अहित के प्रश्न इसके केंद्र में होते हैं| जो विचार आज हमारे मन-मस्तिष्क में वर्तमान हैं कल भी वैसे बने रहें यह नहीं कहा जा सकता| संभव है जिससे हमें आज घृणा है कल के दिन उससे प्रेम हो जाए? जो आज हमें बुरा लग रहा है कल वह एकदम से हमारा सबसे बड़ा हितैषी हो जाए? यह भी कि, जो विचार हमारे लिए महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं वह दूसरे के लिए भी वैसे हों, यह दावा नहीं किया जा सकता| कवि और कविता के लिए महत्त्वपूर्ण है अनुभव, जो हम अपने समाजिक व्यवहार से अर्जित करते हैं| यह बदलते नहीं, परिवर्तित नहीं होते, हृदय में स्थाई स्थान बनाकर रखते हैं| अनुभव में ढेर सारे विचार होते हैं “कवि अपने अनुभव-पुंज से उन्हीं की अभिव्यक्ति करना चाहता है जो सामाजिक अनुभवों से जुड़ते हों, जो अपने माध्यम से समाज की चित्त को आंदोलित करते हों| इन्हें ही सार्थक अनुभव कहते हैं, ये ही अनुभव काव्य में अनुभूति बन जाते हैं|”[6] इसलिए काव्य-निर्माण में विचार आवश्यक न होकर अनुभव बहुत जरूरी हो जाता है| आज के कवि अनुभव के दायरे में रहकर अपनी काव्यात्मक क्षमता का दिग्दर्शन करा रहे हैं, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता|
          विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, केदारनाथ सिंह, श्री प्रकाश शुक्ल, सुशील कुमार, मनोज कुमार झा, विनोद कुमार शुक्ल, माधव कौशिक, जितेन्द्र श्रीवास्तव, कुमार विजय गुप्त, राजकिशोर राजन सरीखे कवि के पास निश्चित ही अपने समय की भाषा, अपना परिवेश और अपना इतिहास-अनुभव है| ये जब कविताएँ लिखते हैं, पाठक के पास बहुत कुछ अर्जित करने और अपने रूचि का देश-समाज निर्मित करने का अवकाश होता है| विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के यहाँ ‘खूँटा’, ‘कहार’, ‘गाय’, ‘हाथी’, ‘हिरन’, ‘केंचुल’, ‘आग’, जैसे विषय हैं जो लोक में रचे-बसे हैं| वे इनसे ही अर्थबोध ग्रहण करते हुए अपनी संवेदना को आकर देते हैं और सामाजिक जीवन में उनकी व्याप्ति दिखाकर पाठक-मन का विस्तार करते हैं| यह विस्तार इस तरह से अपना स्वरूप निर्धारित करता है कि लगता ही नहीं कब हम हाथी पर बात करते-करते आज के सबसे आवश्यक मुद्दे आदिवासी विमर्श पर विचार करने लगते हैं—यथा,-
सारी समस्या दाँतों की थी/ वे उनके दाँत निकाल लेना चाहते थे

वह अपने झुण्ड में चला आ रहा था
मस्ती में झूमता/ सूंड लपलपाता
साथियों को चूमता/ पुचकारता

धांय धांय धांय/ शिकारियों की सधी हुई गोलियाँ
उसके उन्नत ललाट में धँस गयीं/ वह पागल की तरह दौड़ा
मुड़ा/ पीछे हटा/ लड़खड़ाया
और जंगल को कँपाने वाली एक मर्मभेदी चिंघाड़ के साथ
गिर पड़ा/ अकेला
(झुण्ड भाग चुका था
गो वह समर्थ था अपने मुखिया का बदला लेने में)

और अब वे आए घांसों में छिपे शिकारी
उनके चेहरों पर विजय का उन्माद था
उन्होंने उसके दांत निकाल लिए
(जो सर्वोत्तम था उसके पास
जिसके लिए वह मारा गया)

बाकी शरीर उन्होंने सौंप दिए
नंगे-भूखे आदिवासियों को
जो सिर्फ पेट के लिए उनके साथ थे
अपने ही जंगल के विरुद्ध|”[7]
        हाथी से आदिवासी और आदिवासी से जंगल-समाप्ति के षड्यंत्र तक पहुँचने  में कवि का संघर्ष तो दर्शनीय है ही पाठक की जिजीविषा भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है| गहरे अर्थों में यहाँ पाठक-मन में एक विशेष प्रकार का उलझाव दिखाई देता है| यह उलझाव कविता को ठीक-ठीक अर्थ-व्याप्ति तक पहुँचने से रोकता है| पाठक जब जोर देकर पढ़ने की कोशिश करता है तो कविता के साथ सैर भी कर रहा होता है और उसे अपना बनाने के लिए संघर्ष भी| यह संघर्ष ही उसका आनंद है और आनंद प्राप्त करने के लिए उसका प्रयास ही कविता की सफलता है| कविता को सफल बनाने के लिए कवि का ईमानदार होना आवश्यक है| वह विषय-स्थिति को स्पष्ट करने के लिए अपनी निजी अनुभूतियों का स्तेमाल करना अच्छी तरह से जानता हो| भाड़े की संवेदना और अनुभव के सहारे कविता रचने की प्रवृत्ति एक पल के लिए कवि को संतुष्टि दे सकती है लेकिन पाठक-संवेदना में उसके लिए कोई जगह नहीं होगी| विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की मानें तो यह सच है कि “शब्द और अर्थ नहीं है कविता/ सबसे सुन्दर सपना है”-
बेहतर कविता लिखेगा वही
जो बेहतर कवि होगा

जिस समय वह लिख रहा होगा
सबसे अच्छी कविता
जरूर होगा उस समय वह
सबसे अच्छा आदमी
जिस दुनिया में लिखी जायेंगी
बेहतर कविताएँ
वही होगा बेहतर दुनिया

शब्द और अर्थ नहीं है कविता
सबसे सुन्दर सपना है
सबसे अच्छा आदमी का |”[8]      
          किसी परिवेश का निर्माण कई स्तरों से गुजरते हुए होता है| इसलिए यह अपने विशिष्ट रूपों में स्थाई न होकर परिवर्तनशील होता है| मनुष्य का व्यवहार भी परिवेश के अनुसार बदलता रहता है| बदलाव की प्रक्रियाओं से जूझना और उसके बदलते रूप को स्मृति में सुरक्षित रखना कोई आसान बात नहीं है| यहाँ यह सोचना भी अनिवार्य होता है कि मस्तिष्क की चिंतन-प्रक्रिया कभी भी स्थाई नहीं रहती| वह अपने परिवेश जनित सम्पूर्ण परिदृश्य तक गतिमान रहती है| परिणामतः एक ही समय में कई प्रकार की घटनाओं से उसका मस्तिष्क दो-चार होता रहता है| यहाँ रचनात्मक सौंदर्य के लिए कवि के पास स्थायित्व का अवकाश कम मिल पाता है| भ्रमण की स्थिति इस तरीके से उसके मन में वर्तमान होती है, यह निश्चित कर पाना कठिन हो जाता है कि किस घटना का अधिक प्रभाव वह अपने अन्दर आत्मसात करे और किसका कम| संभव है कि किसी के लिए जो घटना एकदम से अस्तित्व का मुद्दा हो, दूसरे के लिए वह कोई घटना ही न हो| यह जरूरी नहीं कि हर घटनाएँ मानव-मस्तिष्क में अपना स्थाई प्रभाव छोड़ने में सफलता प्राप्त कर सकें| फिर, घटनाओं की भी अपनी नियति और अपना परिवेश होता है| कवि इस प्रक्रिया से अछूता नहीं होता| वह नियति को तो दरकिनार करके आगे बढ़ जाता है लेकिन परिवेश की आवश्यकता और जरूरत को विस्मृत और बिसारकर आगे बढ़ना उसके लिए कठिन होता है|
          इस दृष्टि से श्रीप्रकाश शुक्ल का कवि-विवेक हमारे लिए गहरे चिंतन की जमीन उपलब्ध कराता है| वर्तमान के साथ अतीत-परिवेश की विसंगतियों और खूबियों का जायजा लेते हुए मानवीय संवेदना की जो परख करते हैं, वह प्रभावित भी करता है और आकर्षित भी| दरअसल उनके आकर्षण का मुख्य केंद्र भारतीय संस्कृति की वह परंपरा है जो ठेठ लोक से आकार लेकर, लोक-मानस में प्रवेश करते हुए अपना स्वरूप निर्धारित करती है| इनके यहाँ ‘इलाहबाद’, ‘गाजीपुर’, ‘आँधी में काशी’, में निवास करने वाले ‘संतुलन’ बिठाते ‘गंवई गंध’ में रचे-बसे ‘अपनी तरह के लोग’ हैं जो ‘अचार’, ‘चोपी’, ‘बाटी’ आदि की स्मृति और स्वाद को हृदय में समेटे हुए ‘एक सुबह की उदासी’ को ‘ओरहन’ के माध्यम से कहते-सुनते हैं| सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की बंजार जमीन पर भी हास-परिहास के समय का वर्तमान होने की परिकल्पना करते हैं| उत्तर आधुनिक परिवेश में वर्तमान कवियों की तरह होटलों और महानगरों से उपजे बनावटी सौंदर्य की नहीं, ‘पेड़ और पिता’ ‘माँ’, ‘मित्रता’ से संस्कार ग्रहण करते हैं ताकि आने वाली पीढ़ी दादी, दादा और गाँव के परिवेश को विस्मृत न कर सके| परिवेश से कविता गढ़ने और गढ़े हुए कविता से एक नई दुनिया को देखने की यह कला “माँ” कविता में देखी जा सकती है-
दो पन्नों के बीच सटी
या कि सटे पन्नों के बीच अटी
अकसर मेरी दुनिया में माँ प्रकट होती है
और इनको चीन्हने की इच्छा से
बचपन की किसी सुनहरी गुफा में घुसता हूँ
और एक पूरा का पूरा जंगल पकड़ लाता हूँ
जो भाषा के उबटन में पड़कर
कविता की परात में जहर रहा होता है

माघ के मौसम में
पश्चिमी झकोरों के बीच
जब दाँतों से कड़िया के कूटने की आवाज आती है
वह पुवाल की तरह उठती है
और बोरसी की तरह छोप लेती है

अपनी दुनिया की हर मिटटी में
वह बालो की तरह पकी
तथा खलिहान की तरह खाली होती है
और किसी हमीरा जादूगरनी के आतंक से जूझती
सिरहाने की कजरवट में
थोड़ा थोड़ा रोज घिसती है

माँ जब घिस जाती है
मंदिर की घंटियों से घाटियों की आवाज आती है
और विन्ध्य के पठारों से उठता धुंआ
गंगा की सतह पर
थार की तरह फ़ैल जाता है

ठीक ऐसे समय में जब हिमाचल पर गिरती है बर्फ
माँ गल रही होती है
मेरे घर की एक मोमबत्ती जल रही होती है
और मैं बड़ा हो रहा होता हूँ|”[9]
जब हम श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता में पारिवेशिक संरचना की पड़ताल कर रहे होते हैं उस समय कहीं न कहीं पूरा देश और फिर उस देश की भौगोलिक संरचना व्याख्यायित हो रही होती है| इस एक कविता में सम्पूर्ण लोक है और लोक में मनुष्य के होने की संभावना| यहीं संस्कृति अपने सात्विक रूप में परिलक्षित होती है तो समाज संस्कारित हो रहा होता है ठीक उसी शक्ल में जैसे कवि “बड़ा हो रहा होता” है| इनके यहाँ के पात्र हमारे समकालीन समय के पात्र हैं जो शोषित हैं, दमित हैं, लांछित हैं बावजूद इसके एक जिजीविषा है उनके अन्दर और वे संघर्ष कर रहे हैं| इनके कविता के पाठक समकालीन हिंदी के कविता के सजग पाठक हैं जो निराश नहीं होते, हताश नहीं होते, खाली नहीं लौटते मोह ओरमा कर| भरे-पूरे संवेदना में होते हैं और कविता से बहुत कुछ प्राप्त कर रहे होते हैं| निश्चित ही इन्हें काव्यात्मकता की समझ है और काव्यात्मकता को इनकी|
        कुमार विजय गुप्त समकालीन हिंदी कविता में हालांकि किसी संग्रह के साथ वर्तमान नहीं हैं लेकिन मुख्य धारा की प्रमुख पत्रिकाओं में इनकी कविताएँ बराबर पढ़ी जाती रही हैं| सामयिक परिवेश की गहरी पकड़ है इन्हें| घटनाओं को निष्पक्ष नजरिये देखने की इनकी अपनी समझ है जिसे वे किसी झंडे के नीचे न होकर स्वतंत्र रूप से परखते हैं| कवि होने की सच्ची भूमिका का एहसास इनके कवि-कर्म में देखा जा सकता है| इनकी कविताओं से गुजरते हुए यह आभास सहज होता है कि जब सामयिक सामाजिक परिस्थितियाँ जीवन में इतनी अधिक प्रभावी हो जाएं कि समय का एक पल भी किसी भयानक यथार्थ सा कड़वा अनुभव दे रहा हो, कविताएँ वहीँ से अपना आकार लेना शुरू करती हैं| कवि की आवश्यकता समय और समाज को यही से अधिक महसूस होने लगती है| इस बात में कोई दो राय नहीं है कि समकालीन समय अपने तमाम विसंगतियों के साथ इस तरह मानवीय संवेदना पर अपना एकाधिकार जमाए बैठा है कि मनुष्य हतप्रभ सा अनिर्णय की दशा में होकर मात्र उसे सहन करनी की स्थिति तक ही सीमित है|वह लाख प्रयत्न करने के बावजूद कुछ विशेष नहीं कर पा रहा है | जीवन-यथार्थ को देखने और फिर उसे झेलने के मध्य यदि कुछ चल रहा है तो मात्र चौराहे पर इंतज़ार, जहाँ कवि ही नहीं कवि के साथ खड़ा है सारा-का-सारा देश”| कुमार विजय गुप्त की कविताएँ निश्चित ही देश की उस आबादी का प्रतिनिधित्व करती हैं जो अभी तक यही नहीं निर्धारित कर सकी कि आखिर उसका कोना कौन सा है?
         मध्यकालीन परिवेश से लेकर आज तक की स्थिति में आम आदमी मानव द्वारा निर्मित और लगभग सुझाए गए चौराहे के चार दिशाओंमें स्वयं को फिट बैठने में संलग्न है| प्रकृति से हटकर बात करें तो मानव-रूप में निर्मित ईश्वर ने भी उसको यह दिलाशा दिया हुआ है ये सारे रास्ते मेरी तरफ आयेंगे/ मेरी खिदमत में मेरे समक्ष नतमस्तकबावजूद इसके वह छला जाता रहा है| यही से व्यक्ति का मोहभंग होता है और यहीं से वह समाज विरोधी करार दिया जाने लगता है | ध्यान से देखने का प्रयत्न करें तो इसी प्रक्रिया से कबीर छला गया था और ढेर बाद में अँधेरे मेंधकेल दिए गए थे मुक्तिबोध| कवि का यह स्वीकार करना कि-
मैं देख रहा हूँ कि इस चौराहे का चारों कोना
मेरी ही ओर मुखातिब हैं प्रश्नचिह्न की तरह
एक हंस रहा है दूसरा शांत क्लांत
तीसरा रो रहा है जबकि चौथा काफी गुस्से में है
उन्हें भी तुम्हारा ही इंतज़ार है|” छले जाने की स्थिति से दो-चार होना है| वास्तविकता यदि समझने का प्रयत्न किया जाए तो छले जाने की प्रक्रिया में सत्य का आभास होता है जबकि अब यह साफ़ नजर आ रहा हैन तो ईश्वर कहीं है और न ही ऐसा कोई मार्ग जिसके सहारे वह उस तक पहुँच सके| यदि कुछ है तो मात्र दो विरोधी विकल्पजिसमें से उसे एक पर चलना है|
           कुमार विजय गुप्त की कविताई की एक सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे लोक-संवेदना के यथार्थ को अपने कवि-हृदय में जीते हैं| जीने का यह सलीका मैं तर्जनी हूँकविता में खूब सुन्दर तरीके से निखारा है उन्होंने| पूरा का पूरा मुहावरा और युगबोध इस कविता में स्पष्ट होकर नजर आता है| तर्जनी का यह उद्घोस कि मेरे इशारे पर नाचती है दुनिया/ कि मैं नीचे झुकी/ तो तुम्हें जमीन सूंघ जाती है/ सामने की ओर तनी/ तो तुम्हारी अंतरात्मा बिंध जाती हैलोक-संस्कृति में विरोध और प्रतिरोध के तरीके से वर्तमान परिदृश्य के यथार्थ को अपने लोकानुभव के माध्यम से व्यंजित करने का सुन्दर प्रयास है| “कलम की खोलीके माध्यम से ढोल के अन्दर पोल वाली स्थिति चरितार्थ हो उठती है तो यह कुमार के कविताई की अपनी विशिष्टता और अपनी शक्ति है जो आज समकालीन काव्य जगत में कम ही देखने को मिल रही है|
         वर्तमान हिंदी कविता का दायरा विशाल है| कवियों की संख्या भी कुछ कम नहीं है| होना भी नहीं चाहिए| जितने कवि होंगे समाज उतना ही उन्नतिशील होगा लेकिन जहाँ तक हो सके नारेबाजी से बचाव की कोशिश की जानी चाहिए| क्षणिक मुद्दों पर लिखने के लिए अन्य विधाओं की तरफ रुख किया जा सकता है बजाय कि कविता के स्वरूप से छेड़खानी करने के| इधर कई दिनों से और सही कहें तो कई महीनों से एक ही तरह की कविताएँ लोगों के मन-मस्तिष्क में विचरण कर रही हैं| वह हैं राजनीतिक मुद्दों पर  कविताएँ| जनता को जागरूक करना बहुत जरूरी है लेकिन कविता को पूर्ण रूप से चुनाव प्रचार में प्रयोग किये जाने वाले पम्फलेट का रूप दे देना, कहाँ की समझदारी है? कई एक कवियों के संग्रहों और पुस्तकों को देखने के बाद लगता है जैसे मोदी और योगी को कोसने के अलावा इनके पास अब कोई मुद्दा ही नहीं बचा है? उनको कोशकर पाठक के हृदय को छिछला करने से अच्छा है कुछ जरूरी मुद्दों पर बात करना| ‘लोक’ अब भी व्यथित है| प्रकृति अपने अस्तित्व के लिए तड़प रही है| आतताई सम्पूर्ण परिवेश को खा जाने के लिए उत्प्लावित हैं| सम्पूर्ण संसार परमाणु के मुहाने पर खड़ा होकर विनष्ट हो जाना चाहता है और हम हैं कि योगी और मोदी से ही फुरसत नहीं पा रहे हैं|
           ईर्ष्या के निचले स्तर से ऊपर उठने की जरूरत है| गाय, गोबर की राजनीति से हटकर जन-जीवन को सुन्दर बनाने की नीति पर काम करने की जरूरत है| कन्हैया के भाषण और उमर खालिद की आजादी से परहेज करते हुए खेतों और सडकों पर खटने वाले किसानों और मजदूरों के लिए कहने-सुनने की जरूरत है| यदि ऐसा कुछ कवियों से कहा भी जाता है तो संभव है वे नाराज हो जाएं और जनविरोधी करार देकर ‘भक्त’ विशेष की मंडली का अनुचर घोषित कर दें| जो कहें लेकिन अंततः कवि को कवि की तरह पेश आने और कविता को कविता की तरह रहने देने की जरूरत है| यदि इस जरूरत पर अमल करते हुए कविता लिखने की प्रतिबद्धता दिखा सकते हैं तब तो हिंदी का विशाल पाठक समुदाय आपका स्वागत करेगा अन्यथा अभी तो प्रकाशक ही कविता को प्रकाशित करने से मना कर रहे हैं, बाद पाठक भी उपेक्षित करना शुरू कर देंगे |




-अनिल कुमार पाण्डेय
शोध छात्र
पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़



[1] माहेश्वरी, सरला, लिखने दो, बीकानेर : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, 2017, पृष्ठ-27-28   
[2] माहेश्वरी, सरला, तुम्हें सोने नहीं देगी, बीकानेर : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, 2016, पृष्ठ-47    
[3] माहेश्वरी, सरला, आओ आज हम गले लग जाएँ, बीकानेर : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, 2017, (फ्लैप-लेखन से)    
[4] भारती, अरिविंद, युद्ध अभी जारी है, जयपुर : बोधि प्रकाशन, 2017, पृष्ठ-76-77
[5] प्रकाश, उदय, अबूतर कबूतर, दिल्ली : स्वर्ण जयंती, 2005, पृष्ठ-98-99
[6] मिश्र, डॉ० रामदरश, आधुनिक हिन्दी कविता : सर्जनात्मक सन्दर्भ, दिल्ली : इन्द्रप्रस्थ प्रकाशन, 1986,  42
[7] सम०- भारती, अरविन्द, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी : प्रतिनिधि कविताएँ, नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ-51-52
[8] सम०- भारती, अरविन्द, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी : प्रतिनिधि कविताएँ, नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ-66-67
[9] शुक्ल, श्रीप्रकाश, कवि ने कहा, नई दिल्ली : किताबघर प्रकाशन, 2008, पृष्ठ-15-16